Paragraphs

Longer expressions of emotion and storytelling.

Let it go, you've got to forget about revenge. Believe me, in this work I've met a lot of guys who feel the way you do. ...

हे लिसन, एवरीवन विज्ञान कहता है कि ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और ना हो नष्ट किया जा सकता है । उदासी एक ऊर्जा है । इसे ना ही मैनें बनाई है और ना ही मैं इसका विनाश कर सकता हूँ । क्योंकि हमसे पहले भी दुनिया मे उदासी थी ।...

उम्र के सबसे कठिन दिनों में हम चुप हो गए । क्यों ? किसने कहा था ऐसा करने के लिए ? क्या चुप रहने से कठिन दिन आसन लगने लगते हैं ? पता नहीं लेकिन हम चुप हो गए । हाँ शायद डर कर चुप हो गए। हम डर गए है खुद से । इतने डर में हम कब जीने लगे पता ही नहीं चला । . वो केदारनाथ सिंह जी कहते है कि पता है कि लिखने से कुछ नहीं होगा मग़र मैं फिर भी लिखना चाहता हूँ। यही है सारा खेल , लिखना । लिखने से क्या होता है ? कुछ नहीं होता दोस्त , कुछ भी नहीं । ना दुःख कम होते है ना बढ़ते है , दुःख वहीं के वहीं रहते है । हाँ मग़र लिखने के बाद एक हवस जरूर आती है कि इसे तो कोई पढ़ेगा ,, इसे तो पढ़ेगा ही और तारीफ़ करेगा । मग़र क्यों ? ये कैसी हवस पाल रखी है हमने ?ये कैसे चहरे से जी रहे है हम ? किसने दिया हमें ये अधिकार की जाओ और जियो ? क्या सच में हम जीने लायक है ? शायद नहीं है और शायद तभी हम लिखते है और हमारा अंत इस हवस के कारण होगा क्योंकि ये हमें खा जाएगी । हम इससे बच नहीं सकते और ना भाग सकते हैं । क्योंकि हमने भाग कर कोशिश की है क्योंकि उम्र के सबसे कठिन दिनों में हम चुप ही नहीं हुए बल्कि हमनें लिखना भी बंद कर दिया । और हवस ऐसी थी कि हमसे न पूरा चूपी रहा गया न ही लिखना बंद हुआ । और हवस शर्मिंदगी और लेके आयी हैं कि सबसे कठिन दिनों में तो लिखना था हमें । दुनियाभर को बताना था कि समय कठिन है अभी हमारा । हवस के कारण इसके दौरे पड़ते है हमें कि हां पता तो चलना चाहिए सब को कि उम्र के किस पड़ाव में रह रहे है हम । मग़र पता नहीं क्या हुआ कि चुप हो गए । मग़र लिखेंगें जरूर लिखेंगें । ऐसा लिखेंगें कि सब कहेंगें कि हां ये लिखा ना अब तूने । शायद ये मेरी हवस बोल रही है । ....

सुनो , दुआ करो हमारे लिए दुआ करो जरूरी है ये बात मानो हमारी , दुआ करो...

जीवन में जितने प्रेम किये सब अधूरे रहे सब के सब पिता से प्रेम किया मग़र...

जब मैं मरूँगा तब उस दिन वो सब शहर सुने हो जाएंगे एक दिन के लिए जिन-जिन शहरों में मैनें जीवन काटा है जिन-जिन शहरों में घुमा हूँ ख़ुद की खोज में...

मुझे मार दे रब या मुझे उदास कर इतना उदास कि मैं रो जाऊँ...

मैनें पहला झूठ अपनी प्रेमिका को कहा ; कहा कि मैं हमेशा तेरा साथ दूँगा वक़्त चाहे कैसा भी क्यों ना आ जाये मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगा !...

मेरी नाराज़गी ईश्वर से नहीं है मेरी नाराज़गी नियति से है नियति से बढ़कर कोई नहीं है...

मेरी डायरी या मेरे नोट्स में इन दिनों कोई भी कविता नहीं लिखी गयी है ! ये अच्छी बात है या बुरी ? मुझे नहीं पता लेक़िन ये बात अच्छी हो या बुरी मुझे उदास कर ही देगी ! मुझे कविताएं उदास करती है , इतनी जल्दी कि पलक भी कुछ देर लेती है झपकने में ! सवाल ये भी है कि कोई कविता क्यों नहीं लिखी गई मेरी डायरी में इतने दिनों से ? ये सवाल और भी पेचीदा है , ठीक मेरी तरह ! शायद मुझे तेरी याद आजकल कम आती है इसलिए नहीं लिखी गई है कोई भी कविता ! मेरा मानना है कि यादें कविताएं नहीं लिखाती , कविताएं उदासी लिखाती है ! और प्रेम भी ! लेकिन मेरा प्रेम तोह अब भी वैसा ही है तेरे लिए जैसे पहले था ! उसमें कमी ना पहले आई थी और ना कभी आ पाएगी ! क्योंकि ये एक ही पाप है जो मैं ईश्वर से बिना डरे करता हूँ ! प्रेम कम नहीं हुआ तोह भी कविता क्यों नहीं लिखी ?...

इंसान का अकेलापन खतरनाक होता है ! जब अकेलापन जकड़ लेता है तो इंसान को आशा और निराशा दोनों एक साथ झेलनी पड़ती है ! अकेलेपन के कारण एक ही पल में सौ आशाएं जागती है और हजारों निराशाएं आती है ! इन्ही सब कारणों से इंसान अकेलेपन में अजीबोगरीब हरकतें करता है ! सबसे बड़ी अजीब और गलत हरक़त वो आत्महत्या करता है ! अकेलेपन में इंसान तो चाहता है कि कोई उसको सुने , बस सुने ! लेकिन वो उस अकेलेपन को खोना नहीं चाहता क्योंकि वो अपनी एक अलग दुनिया बना चुका होता है उस अकेलेपन में ! जिसमें वो किसी दूसरे की दखलन्दाजी नहीं चाहता और अजीबोगरीब हरकतें करता है क्योंकि इंसान को ये लगने लगता है कि मुझे कोई नहीं समझेगा ! .... ...

साल भर पहले लिखा था कि शहर में मैनें सिर्फ़ नींद खोई है ; अब ये बात ग़लत लगती है क्योंकि देखूं तो सब तो खो चुका हूँ दोस्त खो चुका हूँ...

एक मोहब्बत थी असरे पहले थी अब मारी जा चुकी है उन गलियों से गुजरते हुए...