लेखक/मिर्ज़ा ग़ालिबGhazalमौलिक संग्रहहज़ारों ख़्वाहिशें ऐसीमिर्ज़ा ग़ालिब✦हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले← मिर्ज़ा ग़ालिब की सभी रचनाएँसभी लेखक ↗